From Album: Marasim (1999)

सुबह सुबह एक ख़्वाब की दस्तक पर ,
दरवाज़ा खुला ,
देखा ,
सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आये हैं ,
आँखों से मानूस थे सारे,
चेहरे सारे सुने-सुनाये .
पांव धोये ,
हाथ धुलाये ,
आँगन में आसन लगवाये ,
और तंदूर पे मक्की(corn flour) के कुछ मोटे मोटे रोट(thick indian bread) पकाये.

पोटली में मेहमान मेरे पिछले सालोँ की फसलों का गुड़(jaggery) लाये थे.

आँख खुली तो देखा घर में कोई नहीं था ,
हाथ लगा कर देखा, तो तंदूर अभी तक बुझा नहीं था.
और होठों पर मीठे गुड़ का ज़ायका अब चिपक रहा था .

ख़्वाब था शायद , ख़्वाब ही होगा ,
सरहद पर कल रात सुना हैं चली थी गोली,
सरहद पर कल रात सुना हैं , कुछ ख़्वाबों का खून हुआ हैं ||

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